Anurag Kashyap Should Go And Watch "RAAKH"  

Monday, August 3, 2009


I know this fact that "Anurag Kashyap" is a very-2 good media arranger or promoter. His film was good or bad that is not my point of view. I have also not choosen Anurag's name for generating the readers on my blog but to tell my vision for good cinema. Basically i have no problem with Anurag’s making but to execution of his brain that always shown his egoistic film making rather than his ability to make good cinema.
So lets start with hindi.
"गुलाल" एक ऐसी ही फिल्म है, जिसे देखने की इच्छा तब से थी जब "अनुराग कश्यप" से पहली दफा मिला और गुलाल के संदर्भ में जाना कि ये फिल्म अनुराग ने उस समय लिखी जब वे अपने कष्टों को जमाने की हकीकत से पोछने की कोशिश कर रहे थे। He defined his film as the angriest film ever made in India. मगर जब मैंने फिल्म देखी तो ऐसा कुछ भी नया नहीं लगा जिसकी प्रशंसा में दो-चार शब्द लिखे जाएँ। खैर, आज हम बात करने निकले हैं "आमिर खान" और "आदित्य भट्टाचार्या" की Dark Cinemaराख” की जो मात्र विषयगत ही नहीं वरण निर्माण रुप में भी श्रेष्ट है। यह फिल्म मुंबई अंडरवर्ल्ड की उस खौफनाक अश्लीलता को दिखाने का प्रयास करता है, जहां सिर्फ एक नियम चलते हैं इंसान की हैवानियत, जो अपनी महत्वाकांक्षाओं की आग से समाज की विचित्र रुपरेखा तैयार करता है…। साथ ही इसका मुख्य पात्र न्यायिक आदर्श और अन्याय संबद्ध हिंसा व भ्रष्टाचार के खेल के मध्य प्रयोग के साथ अपने अस्तित्व की खोज भी करता नजर आता है। आमिर खान इस फिल्म में ऐसी ही भूमिका निभा रहे हैं, जो मात्र अपनी हिंदू प्रेमिका के बलात्कार का बदला नहीं लेता है वरण उस नवयुवक को रेखांकित करता नजर आता है जो अपने अंदर की उबाल लेती व्यथा, समाज के प्रति विद्रोही भावना और वर्तमान में चल रहे बहुतों ऐसे कार्य जिससे वह अपने आप को जोर नहीं पाता व भीतरी राख की उस चिंगारी को फूंकता रहता है जहां समाज के सारे मापदंडों को किनारे कर एक दिन उसके खिलाफ खड़ा हो सके।
मेरे लिहाज़ से निर्देशक ने इस फिल्म को कोई हिंदू-मुस्लिम चश्में से देखने की कोशिश नहीं की है ना किसी शिक्षा का बखान किया है बल्कि युवाओं की उस अंतरदशा को दर्शाया है जहां वे मजहबी छीटों से कम, अराजक व दोमुहें नियमों में ज्यादा घुटन महसूस कर रहा है।
"आमिर खान" हिंसक गुस्सैल आवेगी युवा के रूप में बहुत ही प्रभावी व स्वाभाविक लगे हैं। यह उनकी उन कुछ चुनिन्दा बेहतरीन अभिनय में आता है जिसके लिए आमिर खान को "आमिर खान" माना जाता है जबकि आश्चर्य यह है कि यह उनकी दूसरी फिल्म ही है। इस फिल्म के हर दृश्य में गतिशीलता है, Source Light का इतना अच्छा इस्तेमाल शायद मैंने किसी भी हिंदी फिल्म में पहले नहीं देखा। कमाल की फोटोग्राफी दर्शक को सिनेमा के उस तह तक ले जाने की कोशिश करता है जहां शहर की जगमग बत्तियों के तले ही बड़ा अंधकार है, हम आसानी से यह समझ पाते हैं की इसमें minimal light का प्रयोग क्यों किया गया है।
"राख" युवा के मानसिक आघात को लेकर आगे बढ़ती है जबकि सुप्रिया पाठक जो एक मुस्लिम बलात्कार पीड़ित के रुप में इस फिल्म में काम कर रही हैं जिसे एक हिंदू लड़के के सामने ही अपनी गरिमा को खोना पड़ता है; मगर यहां भी निर्देशक इससे आगे जाकर उस तह को टटोलता है जहां मानवीय गरिमा इंसानी सहानुभूति से ज्यादा महत्व रखती है।
प्रतिभाशाली युवा निदेशक “आदित्य भट्टाचार्य” ने एक गंभीर विषय को सामाजिक टिप्पणी के लिए चुना है जहां निराशा अन्याय और इसे जीतने की एक उम्मीद छिपी है। सामाजिक चादर जिसके भीतर हिंसा अराजकता विनाश इसकदर दबी है जिससे सामान्य जीवन अनेकों रुप में प्रभावित होती रहती है मगर जो राख इंसान के भीतर मलबे की तरह जमा होता जाता है वहाँ चिंगारी का प्रतिबिंब भी नजरअंदाज हो जाता हैं। यही गहराई इसे प्रभावी सिनेमा के अग्रणी श्रेणियों में लाकर खड़ा करता है। कम संवादों ने भी इसे और गहराई दी है जिसे आज के Cinamatic Language में Symbolism कहा जाता है, उसे आदित्य में 1989 में दिखलाया है।मानव अस्तित्व की हताशा और उससे लड़ने की बेचैनी, न्याय को मांग़ना या छीन लेना निष्कर्ष के रुप में दर्शकों के लिए निर्देशक ने खुला छोड़ दिया है।
"अनुराग" को ये फिल्म जरुर देखनी चाहिए, अगर देखा है तो एक थाल में "गुलाल" और "राख" दोनों को सजा कर गहराई से निष्कर्ष तक खुद को ले जायें जिससे पता चले कि ये फिल्म उनके गुलाल के रंगीन मतलब को राख की कालिख से कितना पोतती है ।

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"Taare Zameen Par" -- बेहतरीन फिल्म  

Friday, December 21, 2007



रुला दिया यार… सच में मुझे खुद से मिला दिया…।
सिनेमा हाल से निकलते हुए मैं अपनी यादों अपने ज़ज्बातों,
ढेर सारी उल्झनों और दामन भर आशाओं के अश्रुओं को
पोछता सपनों को बुनता हल्के कदमों से बाहर निकला…।

प्रथम…प्रथम…प्रथम!!! घुड़-दौड़…घुड़-दौड़… बस यही है
मंत्र यहाँ का कोई ये अपने बच्चों को नहीं सिखलाता, अच्छाइयाँ
किसे कहते हैं, प्यार से उनके सर को सहलाता नहीं, उनकी बहुत सी
अलग विशेषताओं को कदमों का सहारा नहीं मिलता, ये नजरअंदाज
कर दिये जाते हैं; बस यही सीख मिलती है, तुम्हें अपने साथी को
हराना कैसे है…। अपने भीतर की कुंठा का बीजारोपण अपने बच्चों
पर करते जाते हैं… फिर इसे प्रतिष्ठा से जोड़ लेते हैं, सोंचते
हम अपने अनुसार हैं पर खुद के सपनों को नन्हें-मुन्ने खूबसूरत
कोमल स्पर्शों पर थोप देते हैं… और जब हमारे खुद के सपने पूरे
होते नहीं दिखते हैं तो दोष भी उन नन्हें चेहरों पर मढ़ देते हैं…।
यही संदेश हमारे सामने "आमिर खान" लेकर आये हैं अपनी
एक बेहद संजीदा व बेहतरीन फिल्म "तारे जमीन पर" के साथ।




अगर फिल्म के इस बेहत जटिल किंतु महत्वपूर्ण संदेश को
थोड़ी देर के लिए छोड़ दिया जाये तो देखते हैं कि एक नवोदित
निर्देशक
जो इस फिल्म के निर्माता भी हैं, कितनी समझ रखता
है विषयों का उसे प्रस्तुत करने का… शानदार अभिनय के साथ-2
बेहतरीन संकेतों के द्वारा फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाया गया
है…एक निर्देशक को जबतक कहानी का मनोविज्ञान नहीं पता
होगा वह ऐसी फिल्म बना ही नहीं सकता… उसे पता है कि बच्चों
का मस्तिष्क सोंचता कैसे है, व्यवहार कैसे करता है प्रत्येक
व्यवहार का एक अलग अर्थ होता है जिसे सिनेमा के परदे पर
उतारना शायद बहुत कठीन है…अपनी पहली फिल्म बनाने में
यह मुझे दिख रहा है। जो साहित्य में लिखा होता है उसे चरित्र
में ढालना ही सिनेमा का सबसे बड़ा आविष्कार है… इसमें
"आमिर खान" जो वैसे ही भारत के कुछ एक-आध महान
कलाकारों में गिने जाते हैं एक महान निर्देशक भी साबित हुए हैं…
फिल्म के प्रत्येक पहलुओं को महसूस किया है… किस लिए
"अमीर" साहब को Perfectionist
कहा जाता है ये सिनेमा के तत्वों को छू कर ही समझ आता है…
दर्शील सफारी का अभिनय एक ऐसे बच्चे के रुप में है जो अपनी
उमंगों से होता हुआ अंधकार की ओर चला जाता है… बेहतरीन
से भी ज्यादा सुंदर शब्द हो तो वह भी चलेगा… निर्देशक ने
कथा के अनुसार उसके भीतर की समस्त कलाओं को बाहर निकाल
लिया है… आपको पहली ही नजर में उस बच्चे से प्यार हो जाएगा…।





फिल्म एक ऐसे बच्चे की दास्तान है जो पढ़ाई-लिखाई में काफी
कमजोर है, उसे कुछ भी समझ नहीं आता की करना क्या है…
क्लास में हमेशा फेल होना किसी भी चीज को ठीक से याद नहीं
करना मात्र खुद में डुबे रहना… जिसका बड़ा भाई अपनी क्लास का
टॉपर है, उसके साथ उसकी तुलना किये जाना आदि-2, वह बालक
लगातार इन परिस्थितियों से जुझता रहता है… उसके अंदर का
आत्मबल समाप्त हो जाता है, जबकि ऐसा नहीं है कि वह चाहता
नहीं कुछ करना पर कोई उसे ठीक से समझने वाला नहीं है…
सभी उसे सिर्फ कोसते रहते है परिणाम वह गहरी मायूसी
ओढ़ लेता है… औरों से दूर हटता जाता है… बिल्कुल खामोश हो
जाता है। एक दिन उसे अपने परिवार से अलग हो जाना पड़ता
है और एक आवासीय विद्यालय में उसका दाखिला करा दिया जाता
है जहाँ वह बालक और भी विलग हो जाता है… फिर एक सबेरा
क्लास में नया कला का शिक्षक लेकर आता है जो उसे जानने की
कोशिश करता है… उसके अंदर की अच्छाइयों को
परखता है बाहर आने का खुला मौका देता है…।




बाल मनोविज्ञान पर काफी दिनों बाद गंभीर फिल्म बनी है…
कहानी का मात्र वह बालक ही HERO है, "आमिर खान" एक
सहायक कलाकार के रुप में हैं जो निश्चित ही बड़ा साहसिक कदम
है… जो संपूर्णता में सिनेमा को देखना जानता है… शाहरुख खान
साहब और ऐसे कई कलाकारों को उनसे सिखना चाहिए, मात्र पैसा
कमाना ही एक अहम ध्येय नहीं है कुछ ऐसा भी करो जिसे लोग
बाद में भी याद करें… आज से 20-30 साल बाद शाहरुख भाई की
कितनी फिल्मों को लोग याद रखेंगे दो हफ्ते में ही ओम-शांति-ओम
भुला दी गई… चक-दे, जो देखा जाये तो विश्व की कुछ 4-5 खेल
फिल्मों की नकल है को उनके फैन ने आसमान पर बिठा दिया
चूंकि कहने के लिए DDLJ के अलावा कोई भी फिल्म स्तर की नहीं
है… हाँ मन को कुछ देर तसल्ली जरुर देती है पर कुछ देर की
तसल्ली ही जीवन का आधार तो तैयार नहीं करती…।

इस फिल्म का संगीत पहले मुझे बहुत अच्छा नहीं लगा था
किंतु जब फिल्म मैंने देखी तो कहानी के साथ-2 प्रसून जोशी
के शब्द भी मुखर होते गये… पिछे का संगीत एक अजब छाप
छोड़ता नजर आता है, पूरी फिल्म टूटते शीरे को जोड़ते हुए
आगे बढ़ती है…मुझे कहीं नहीं लगा कि निर्देशक कहानी से भटक
गया है… बहुत ही अच्छा कैमरा का इस्तेमाल “सेतू” ने किया है…
सारे CUT इतने साफ हैं कि आंखों को कहीं नहीं चुभते, फिल्म में
रंगों का चुनाव जो मात्र कपड़ों तलक नहीं है कहानी से बिलकुल
मेल खाता है, लाईट का प्रयोग भी बेहतर है पर कहीं-2 थोड़ा DULL
दिखता है… फिल्म आपकों एक बच्चें के भीतर उसके अंधकार
में ले जाती है जैसे-2 हम आगे जाते हैं जटिलताएँ और भी गहरी
होती जाती हैं… मैं तो खुद को ही देख रहा था कि कौन सी गलतियाँ
मेरे माँ-पापा ने मेरे साथ की… मैं तो इतना ही जानता हूँ कि बच्चों को
पौधों की तरह रखो, जैसे हम एक पौधे को संभालते हैं धूप से, ज्यादा
ठंड से, तेज झोकों से, ज्यादा खाद ज्यादा पानी भी एक पौघे को नुकसान
पहुंचा सकता है वह मुरझा सकता है वैसे ही हमारे ये जमीन के सितारे हैं,
भविष्य हैं और कोई भविष्य को भी घुड़-दौड़ में शामिल करता है, नहीं!!!
भविष्य को हल्के सहारों से बनाया जाता है आत्मबल पैदा करके… हम
सबकुछ समझते है पर खुद के बच्चों को उसके अनुसार नहीं ढालते हैं
उन्हें उन्हें सपनों को रचने का कोई मौका ही नहीं देते बस खुद को उनके
द्वारा श्रेष्ठ साबित करना चाह्ते हैं…।



मैं मान गया "आमिर खान" को, जो हिम्मत दिखा सकता है कुछ नया
करने लिए…। इस फिल्म में एक सीन है जब बच्चा अपने परिवार से
दूर चला जाता है तो खुद की एक "स्क्रिप्ट स्केज बुक" तैयार करता है,
जिसे जब उसकी माँ पलटती है तो सच कहूं जनाब दर्शक की आँखें
नम हो जाती हैं…।
मेरे लिहाज से ये इस साल की सबसे बेहतरीन फिल्म हैं और मेरा
सरकार से ये आग्रह है कि जितनी जल्द हो इसे टैक्स-फ्री किया जाए…।
बच्चे तो बाद में इसे देखने जायें पर अभिभावक जरुर पहुंचे एवं देखें
की कौन-सी राह हमने चुनीं है अपने भविष्य को बनाने के लिए…।

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"Saawariya" -- कुछ तो लोग कहेंगे  

Sunday, December 9, 2007



यहाँ यह शीर्षक मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण है, जिसका चुनाव
बहुत सोच-विचार कर किया गया है… हाँ यह सच है कि काफी
विलम्ब हो चुका है इस फिल्म के संदर्भ में कुछ-भी कहने-सुनने
के लिए पर अच्छी बातों का कोई समय नहीं होता।
“सांवरियाँ” मेरे लिहाज से इस साल की कुछ बेहतरीन फिल्मों
में से एक है…बहुत सी बाते हैं जो शायद लोग समझना नहीं
चाहते या उन्हें समझ नहीं आता। इस देश में खासकर हिन्दी
सिनेमा में “भंसाली” से बेहतर और कोई निर्देशक मुझे नजर
नहीं आता जिसके पास हिम्मत है कुछ नया कर दिखाने की…
हम हजार बार यही दोहराते हैं कि हमारी फिल्मों का स्तर बहुत
नीचा है पर मैं यह सेहरा हमारे आलोचकों को भी देना चाहूँगा
जो लोगों को पहुंचने ही नहीं देते या फिल्मों पर इसतरह लिखते
हैं कि उसे पढ़ने के बाद यही लगता है कि ओम-शांति-ओम जैसी
फिल्मों का ही भारतीय हिन्दी सिनेमा में अस्तित्व रहेगा।



काफी बुराई होने बाद भी मुझे इस फिल्म में जो चीजें छू गईं
वह जरुर बताना चाहूँगा… “सांवरियाँ” नाम से ही पता चल रहा
है कि यह कृष्ण को कहीं कल्पनाओं में पाने की एक जद्दोजहद
है और है भी…।फिल्म पूरी तरह से कल्पना में ही है और अगर
आप इसको इस प्रकार देखें तो पता चलेगा कि हमारी कल्पनायें
बहुत जटिल होने के बाद भी मन को शकुन पहुंचाने वाली होती
हैं क्योंकि जिसे हम जागृत अवस्था में पाने का प्रयास करते हैं
वही हमारे सपनों में भी आता है यानि जो मुझे अच्छा लगे या
मन को भा जाए… यही बात गुलाबो जी (रानी मुखर्जी) के साथ है…
है तो वह एक तबायफ ही, उसे भी सपने देखने का हक है और
वह देखती भी है, उसे भी सपनों का राजकुमार चाहिए जो उसे लेकर
कहीं अनजानी रंगीन दुनियाँ में जाएगा पर उसका Dream Sensor
इसे थोड़ा बांध देता है, वह उसे चाहते हुए भी नजदीक नहीं लाना
चाहती, उसके सपनों का राजकुमार दूसरे को तलाश करता है जिसे
गुलाबों नहीं पा सकती चूँकि वह खुद को जीवन के उन अंधेरों में
देखती है जहाँ उसके सामने आशा का किनारा ही नहीं है…।
तो हमारी “सकीना” का जन्म होता है जो “इमान” के प्यार में
सबकुछ छोड़कर मात्र एकटक प्रतीक्षा-लीन है… इमान जो ईश्वर
का संकेत देता है… वह कृष्ण भी हो सकता है, वह जब भी परदे
पर आता है सारा माहौल नीले रंग से रंग जाता है… यह राधा का
प्रेम भी दर्शाता है… प्रतीक्षा। पर असल में कृष्ण तो राज (रणवीर)
है जिसे प्रेम, प्रेम और प्रेम के अलावा कुछ भी नहीं दिखता और
यही लय है भंसाली की…। वाकई मानसिक चित्रण का यह बेहतरीन
अनुभव इसी निर्देशक से अपेक्षित हैं… क्या संकेत है… दरिया के इस
पार अपने कृष्ण को निहारती राधा, लेकिन राज तो मिल भी नहीं
सकता था सकीना से क्योंकि वह तो सपना था गुलाबों का
(“गुलाबों के मन का कृष्ण”) जिसे वह अपने पास तो नहीं ला
सकती किंतु उसे किसी के साथ बांटना भी नहीं है। 'संजय
भंसाली'
ने राज को मार भी खिलबाया है जिसका संकेत बहुत
स्पष्ट है…। हम इस कहानी में इससे ज्यादा की मांग नहीं कर
सकते… कल्पना तो कल्पना होती है और जिस खूबसूरती से इसे
पेश किया गया है जब मैं देख रहा था मेरा मन ऐसे ही कई
खूबसूरत पात्र बना रहा था जिसे अब तक सामान्य जीवन में
सही होता हुआ मैंने नहीं देखा है। मैं इतना प्रफुल्लित हो रहा था कि
मेरी व्यस्तता के बावजूद भी मैं इतने दिनों बाद भी इसपर
लिखने को आतुर हुआ… निश्चित ही यह कोई समीक्षा नहीं है
पर एक सटीक नजर है…। मेरी इस लेखनी के बाद जो भी
व्यक्ति इसे देखे वह अपनी प्रतिक्रिया का अनुभव मुझे अवश्य
बताए… क्योंकि मुझे यह लगता है कि इसे देखने का दृष्टिकोण
थोड़ा बदलना होगा…।

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SALO- 120 दिन सोडोम का…एक समीक्षा।  

Friday, November 30, 2007



MOVIE - Salo or The 120 days of Sodom
(Salo le 120 giornate di sodoma)
YEAR - 1976, Italy
DIRECTOR - Pier Paolo Pasolini
GENERE - Drama, War
CAST - Giorgio, Umbreto
LANGUAGE - Italian, French, German
"BIG DADDY OF ALL DISTURBING MOVIE"
मेरे लिए इतना ही कहना शायद ज्यादा है…।
कल ही मुझे इस फिल्म की कॉपी उपलब्ध हुई;
जब से इसके बारे में सुना था इसे देखने का
मेरा मन इसकदर उतावला हो रहा था कि
बार-बार प्रयास करता था कि ये मुझे देखने
को कहीं मिल जाए।
यह एक RARE FILM है जिसकी
DVD मिलती ही नहीं है…पर
किस्मत साथ था और सारी
कायनात ने मिलकर मुझे
इससे मिला दिया…
(ओम शांती ओम से लिया)…
हाSSहाSS
खैर, जिन बंधुओं को भी परेशान
(Disturbing) करने वाली
फिल्म अच्छी लगती है…
वे इसे एकबार अवश्य देखें…
फिल्म के रिलीज के दिन
ही इसके डॉयेरेक्टर की
हत्या दिया गयी थी, जो
अपने-आप में एक बड़ा सदमा है।



एक प्रबल दु:खद, मानसिक, शारीरिक यातना की पराकाष्ठा
पर केंद्रीत अति-विवादास्पद फिल्म जिसे देखने के लिए
एक बिल्कुल सामान्य शांत मस्तिष्क का होना जरुरी है…
आज भी कई देशों में ये मुवी प्रतिबंधित है…।
साधारण रुप से इसकी कहानी विश्व युद्ध-2 पर आधारित है।
इटली पर मुसोलनी के शासन का अंतिम
दौर … Republic Of Salo एक फासीवादी राज्य, जो
जर्मनी के कब्जे में था 1944 में। Pasolini ने शायद
बहुत करीब से सारे मंजर को देखा था और काफी
यातनाएँ भी झेली थीं, यह फिल्म उसी भीतरी
आक्रोश का परिणाम था किंतु इसके बनते ही
उनकी हत्या कर दी गई…।
इस फिल्म का प्रत्येक दृश्य दहला देने वाला है जिसे आम
दर्शक तो निगल ही नहीं पायेगा… बहुत सारे NUDE SCENES
हैं या यों कहें पूरी फिल्म ही ऐसे ही है जो बहुत ही सांकेतिक
है… शासन के चार मुख्य स्तंभ -- The Duc, The President,
The Bishop, The Magistrate जो शायद धुरी राष्ट्र को दर्शाता
है जहाँ 18 पुरुष और 18 महिलाओं को अपहृत कर एक बड़े से
महल में रखा जाता है… साथ में चार वैश्याएँ होती हैं जो
काम-वासना के नए-नए तरीके सिखाती हैं… और बहुत
सारे शारीरिक और मानसिक यातना के बाद उनकी
जघन्य हत्या कर दी जाती है… वैसे अगर देखा जाए तो
यह एक बहुत ही साधारण कहानी है पर जिस प्रकार से
इसे चित्रित किया गया है वह निश्चित ही देखने लायक
है… शायद आप भूत की फिल्म को देख उतना ना डरे पर
जो घबराहट इसे देखते हुए मुझे हुई वह मैं बता ही नहीं सकता,
पूरा एक दिन मुझसे खाना नहीं खाया गया…।
जितने भी बलात्कार, मानसिक यातनाएँ हुई हैं इसमें कोई
भी दृश्य अकेले में नहीं फिल्माया गया है सारे-के-सारे
दृश्य कम-से-कम 30-40 लोगों के सामने है…
सबसे डरावना सीन है-- जब महिलाओं को नंगा
कर गले में कुत्ते का पट्टा बांधकर कच्चा मांस खाने
को मजबूर किया जाता है सच कहूं बहुत ही घिनौना
है… ओ ओ SSSS
लेकिन ये सब इतना सांकेतिक है कि थोड़ा सोंचा जाए
तो डॉयेरेक्टर के अंदर की बात सामने आने लगती है,




मानव का भीतरी अंतस पाशविक वृत्तियों का ही गुलाम
होता है जिसे अगर पूर्णत: स्वतंत्र कर दिया जाए तो
वह जानवर के जैसा ही व्यवहार करेगा और यही मानवीय
अंधेरा जो हम सभी में व्याप्त है इस फिल्म का मूल
संदेश है… इसे इतना विकृत रुप में दिखाया गया है
जिसे हम देख ही नहीं सकते…। बहुत ही जटिल फिल्म
जो हमें हिटलर, मुसोलनी जैसे कुत्सित व्यक्तित्व का
सच प्रकट करती है… आप साधारण रुप में तो इसे देखने के
बाद मानव से ही घृणा करने लग जाएंगे। कई समीक्षकों
ने तो यहाँ तक कहा की यह फिल्म नहीं Posolini के
Sexual Frustration का परिणाम है जो 18 महिलाओं और
18 पुरुष को असामान्य रुप में संभोग करते देखना व खुद
को आनंदित करना है…।
हाँ एकबात अवश्य कहना चाहूंगा कि यह फिल्म आम
लोगों के लिए तो है ही नहीं और पारिवारीक तो
बिल्कुल नहीं, अगर यह फिल्म मिल जाए तो
यह अवश्य सुनिश्चित कर लें की आपकी मानसिक
स्थिति इसे पचा ले…।

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सिनेमा…Entertainment औR कला !!!  

Saturday, November 3, 2007




विश्व सिनेमा का इतिहास काफी पुराना है… जब पहली
बार Pinhole camera(Aristotle)का निर्माण संभव हुआ और बाद में
Frisius ने Camera Obscura ( जिसमें कोई लेंस नहीं था…मात्र कुछ
कागज के टुकड़े थे) ने सिनेमा का मार्ग प्रशस्त किया…फिर यूरोप के
Lumiere Brothers ने 1895 में कैमरा और प्रोजेक्शन को मिला पहला
Cinematography कैमरा तैयार किया जिसमें 35mm film / 16f/s के
हिसाब से चलता था इस कारण ही उस वक्त के सिनेमा-पट पर पात्र तेज
गति से चलते नजर आते थे…। भारत में भी इसकी शुरुआत 1896 में
होटल वॉटसन परिसर में उपर के दोनों भाइयों ने ही अपनी पहली मुवी
"Arrivee d'un Train a la Gare de Ciotat" (Arrival of aTrain at Ciotat
Station) और"La Sortie de l'Usine" (Leaving The Factory) दिखाई
जो सिर्फ यूरोप में दिखाने के 6 महीने बाद ही भारत मे भी लाई गई थी।
मेरा ये सब लिखने का मात्र यही कारण है कि अगर सामन्य रुप से देखा
जाए तो हम मात्र आधे साल ही पिछे हैं सिनेमा के स्तर से किंतु हमारा
सिनेमा लगातार पतन की ओर ही उन्मुख हैं… साल में कुछ 2-4 ही
ऐसी फिल्में आती हैं जिसे देखकर लगता है कि वह हमसे कुछ कह रही हैं…
जिसमें कुछ नई बात होती है…जो हमसे प्रश्न पूछती है…जो दिखलाती हैं
कि इसका सही रुप क्या है…।
सिनेमा-- The Highest Form Of Art मतलब साफ है कि यह
एक ऐसा कला-माध्यम है जिसके गर्भ में समस्त कला का समागम संभव
है और है भी, जहाँ कला का पूरा स्वरुप निखर कर बाहर आता है…पर
हमने क्या किया है इसे और ज्यादा निखारने के लिए मात्र पैसे के लिए
हमने इस कला को गर्त में पहुंचाया गया… कहते हैं कि Canne's Film fest..
में लोग हमारी फिल्मों को देखकर हंसते-2 गिर जाते है। जब हमारा भारत
80% अशिक्षित था तब हमारे हिंदी सिनेमा ने राज-कपूर, बिमल राय,गुरु-दत्त
जैसे महान निर्माता- निर्देशक दिये ,जिनकी फिल्में हमारे पास एक अद्भुत
संग्रह के रुप में मौजूद हैं एवं बाक्स आफिस पर हिट भी रही हैं पर आज
जब हम 80% शिक्षित हैं तो सिनेमा का स्तर और ज्यादा गिर गया है…
हाँ एक बात मै बताना चाहता हूँ कि ये सभी बातें मैंने मात्र "हिंदी सिनेमा"
के लिए की हैं… भारत में ही दो ऐसे प्रांतीय सिनेमा उद्योग हैं---
एक "बंगाली" दूसरा "मल्लयाली", जिसने एक से बढ़कर एक फिल्में भारत
को दी हैं… मौका मिला तो कुछ फिल्में जो मैंने देखी हैं उसपर चर्चा अवश्य
करुंगा। तो यह कीड़ा सिफ हमारे उद्योग को ही लगा है, जो एक बड़ा अश्चर्य है…
हमारे सारे फिल्म उद्योग के लोग यही कहते पाये जाते हैं कि अभी हमारा
समाज अनुभवहीन हैं पर जो नंगा नाच हमारी फिल्मों में दिखाया जा रहा है
वह तो यही वर्ग है जो समझता भी है और मजे भी लेता है किंतु अर्थपूर्ण
सिनेमा के लिए यह वर्ग तैयार नहीं है, कुछ अजीब नहीं लगता है…???
आज हम निश्चित ही सिनेमा के लिए अशिक्षित हैं पर इसे
सिनेमा के द्वारा ही शिक्षित भी किया जा सकता है… स्कूल में हम निरंतर
उच्च शिक्षा की ओर बढ़ते रहते हैं और यह काम एक शिक्षक का होता है…
उसीप्रकार एक निर्देशक ही हमें उस मकाम तलक ले जा सकता है जहाँ
“विश्व सिनेमा” पहुंचा है…।

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अरस्तु की आँखें और सिनेमा…  

Monday, August 27, 2007

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


अरस्तु जो महान विद्वान था और साथ ही दार्शनिक
भी…शायद ही कोई विधा हो जिसमें इस महान
व्यक्तित्व ने अपनी दृष्टि न रखी हो… जिसमें सिनेमा
भी प्रमुख था उसपर लिखी गई पुस्तक थी Ars Poetica
(सिनेमा पर टीका-टिप्पणी) जिसमें बड़े वैज्ञानिक तरीके
से यह देखने की कोशिश की गई कि ऐसी क्या
चीजे हैं जो इतने लोगों को थियेटर में खिंच लाती है,
वैसे तो यह किताब बहुत उदासिन है पर सिनेमा की
संरचना को समझने के लिए इससे उत्तम पुस्तक
नहीं है जो सिनेमा का सच कहा जाए तो पूर्वज है…
इस पुस्तक में कई ऐसी बातें थी जो हम आज भी
उपयोग में लाते हैं चाहे जाने हुए या अनजाने में…।
अरस्तु ने नाटक की संरचना को देखते हुए तीन प्रकारों
में विभक्त किया है--
1) Tragic Structure
2) Epic Structure
3) Comic Structure
और यही हमारे सिनेमा का आधार भी है… अंतर मात्र
यह है कि भारतीय सिनेमा Epic Structure(जिसमें
कहानी के भीतर कई कहानियों का संग्रह हो…साथ
इसकी संरचना ढीली हो) को मानता है या उसपर
आधारित है, मगर अमेरिकन सिनेमा Tragic Structure
(जिसमें एक कहानी और संरचना कसी हुई हो) का
अनुसरण करता है…।
भारतीय सिनेमा का आधार ही सच कहा जाए तो
काफी ढीला है जिसके कारण हम एक अच्छी फिल्म
नहीं बना पाते… चूंकि हमारे ज्यादातर फिल्म-मेकर
अनपढ़ हैं(सिनेमा के संदर्भ में) हैं जिसे पता ही नही
कि सिनेमा,(जिसे दुनियाँ का सबसे बड़ा कला का
स्वरुप माना जाता है) कहते किसे हैं बस मात्र चरित्र
को परदे पर दौड़ा देना पेड़ के साथ गाने गाना इसी
को सबकुछ मानकर पेश किया जाता है…। हमें
काफी कुछ जानना है कई सारी पद्धतियों को समझना
है मात्र कपड़े उतारना ही नहीं उससे ऊँची छलांग की
आवश्यकता है…।

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My Salute To The Real Genius... "Kishore Kumar"  

Saturday, August 4, 2007



"कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा"
जब भी मैं मुड़कर देखता हूँ,
हमेशा यही सोंचता हूँ कि क्या
व्यक्तित्व पाया था, इस इंसान ने।
वे सिनेमा के सच्चे प्रतिभा थे, जिसने
हर क्षेत्र में अपनी एक अलग और
उम्दा पहचान बनाई…
"आभास कुमार गांगुली" को शायद
आज की पीढ़ी भुल गई हो किंतु
"किशोर कुमार" की आवाज को शायद
ही किसी ने न सुना हो… 4 Aug.1929
को मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में इस
महान कलाकार का जन्म हुआ…वैसे तो
इनके बड़े भाई "अशोक कुमार साहब"
उन चुनिंदा व्यक्तियों में थे जिन्होनें
भारतीय सिनेमा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया…उस बड़े
व्यक्तित्व के सामने अपने को खड़ा करना, उस नाम से अलग एक
नई पहचान बनाना शायद बहुत मुश्किल था पर जो चुनौतियों को
पहचान सही मार्ग का अनुसरण करता है वही महान कहलाता है…।
"The Real Genius & Most Versatile Personality Of All Time"
किशोर कुमार, सिनेमा जगत के वह कलाकार थे जो एक साथ अभिनय,
गायकी,निर्देशक, निर्माता, लेखक, गीतकार सभी भुमिकाओं में अपने
को ढाला और कई सारे रचनात्मक आधार दिये, भारतीय सिनेमा के लिए…।



"जिद्दी"(1948) पहली फिल्म थी जिसमें इन्होंने अपना पहला
गाना गाया … "आंदोलन" फिल्म से अभिनय शुरु, "लड़की" (1953)
फिल्म ने पहचान दी जो ऐसा चला कि लगभग 80 फिल्मों तक
चलता गया… जिसमें कई सारे हिट्स थे …।
S D Burman साहब ने इनकी आवाज को सही रुप में पहचाना
और फिर क्या था किशोर साहब ने फिर कभी मुड़कर नहीं
देखा…।

अभिनय और गायकी के साथ-साथ उन्होनें कई फिल्में भी
बनाई जिसमें "दूर गगन की छाँव में" और
"दूर का राही" प्रमुख है, जिसमें इनको अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी
मिली…।

इनकी कॉमेडी को कौन भुल सकता है… चाहे वह "हॉफ टिकट"
हो या "चलती का नाम गाड़ी" या फिर "पड़ोसन" सभी एक से
बढ़कर एक हैं… और कैसे भुल सकता है…
कोई The Best Romanatic Song Ever made…
"एक लड़की भींगी भांगी सी" जो "चलती का नाम गाड़ी" से ही था और
परदे पर खुद किशोर दा और मधुवाला ने इसे निभाया था…।


कहा जाता है कि राजेश खन्ना को सुपर स्टार बनाने में इनकी
आवाज की भी एक प्रमुख भुमिका थी… 1969 में जब अराधना आई
तो "रुप तेरा मस्ताना" और "मेरे सपनों की रानी"
जैसे गीतों पर सारा देश झुमने लगा… वे गाते थे तो लगता
था कि बस सुनता जाये कोई… भारत के एकमात्र पार्श्व गायक जिनकी
आवाज मर्द की आवाज थी…इन्होनें न तो कोई क्लासिकल गायकी
की शिक्षा ली थी न वो एकमात्र गायक ही थे… "लता दी" ने भी कहा
था कि "किशोर दा" संपूर्ण कलाकार थे…।
उनके प्रमुख गानों में---
"वो शाम कुछ अजीब थी"
"कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा"
"मेरे नैना सावन भादों"
"गाता रहे मेरा दिल"
"फूलों के रंग से"
"कोरा कागज था ये मन मेरा"



आज हमारे अपने किशोर दा का 78th वां जन्मदिन है और
मैं इस महान कलाकार को सलाम करता हूँ…।
चन्द शब्द जो उनके स्मरण मात्र से मेरे ज़हन में उभर आता है---
"वो आवाज ही थी जो सदियों से पुकारती थी दिल में,
वो आवाज ही थी जो शाम तलाशती थी दिल में,
वो आवाज ही थी जो भटकती थी तमन्नाओं के दिल में,
वो आवाज ही थी जो कश्ती थी बहारों की दिल में।"

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This Is..."My World Of Cinema"  

Thursday, August 2, 2007



"सिनेमा" शब्द ही सुनते मन उसके संदर्भों
को ज्ञात करने के लिए उत्सुक हो उठता है,
मात्र भारतीय ही नहीं वरन विश्व के सभी
कोने में अवस्थित अन्य भी यही सोंचते हैं।
सिनेमा का जो सबसे अवरोधित ढाँचा है वह
भारतीय परंपरा के पैरों तले दबा पड़ा है…
मुझे यह कहते जरा भी संदेह नहीं होता है
कि विश्व सिनेमा के किसी भी परिपेक्ष में हम
अत्यंत पिछड़े और अज्ञानी हैं… क्योंकि हमने
सिनेमा को मात्र अपने मनोरंजन के
साधन के रुप में लिया है जो सबसे
बड़ा हास्यास्पद विषय है, जबकि आज
हम लगातार शिक्षा की नई सीढ़ियों
को छूते जा रहे है, हमारे सिनेमा का
स्तर लगातार गिरता ही दिख रहा है।
सबसे अचरज की बात तो यह है कि
हम वो सभी भी भूलते जा रहे हैं जो
हमारे पूराने सिनेमा के शिक्षकों ने
सिखाया था… चाहे वह "बिमल राय" हों
या "राजकपूर" फिर चाहे "सत्यजित रे"
हों या "रित्विक घटक" ; आज कोई
भी एक ऐसा निर्देशक नहीं है जिसकी
कल्पनाशीलता उसकी सोंच इनके किसी
स्तर को पकड़ भी पाती हो…



बड़ा अफसोस होता है यह सुनकर
कि आज तलक विश्व स्तर पर
हमारे कुछ गिने-चुने फिल्मो को
छोड़ किसी भी फिल्म ने अपनी
पहचान नहीं बनाई… बड़ा गंभीर
प्रश्न है यह मगर साथ में सोंचनीय
भी…।
हम चाहे लाख यह कह ले कि
ऑस्कर में हमारे साथ न्याय नहीं
होता, शायद आज से साल भर पहले
मैं भी कुछ ऐसा ही सोंच रखता था
पर जब अन्य देशों में बनी बहुत सी
फिल्में देखने का मौका मिला तो मैं
दंग रह गया… क्या क्लास है…क्या
सोंच है…क्या स्तर है…

सिनेमा को कला का सबसे प्रभावी
और बड़ा रुप माना जाता है क्योंकि
यहाँ सब आ जाता है, चाहे वह चित्रकला
हो या शिल्पकला…दर्शन हो या नाटक।
इन सारे तत्वों को जिस रुप में विदेशों
में लिया गया है वह नितांत ही सराहनीय
है…। अरस्तु ने Ars Poetica में इसपर
काफी चर्चा की है और सबसे ज्यादा
महत्वपूर्ण बात उन्होनें जो बताई वह
यह की नाटक को देखकर जब व्यक्ति
अपने CATHARSIS ( अपने अंदर दबी
हुई कई सारी भावनाएँ) को उठेल देता है
और खुद में कोई नई आकृति को पनपता
देखता है वहीं वह सबकुछ पा जाता है… यही सिनेमा का भी एक
महत्वपूर्ण आयाम है जब हम उसे देखकर अपने अंदर
दबे हुए उन सारे जटिलताओं को परदे पर चल रहे
चरित्रों के द्वारा पूरा होते पाते हैं तो जो एक
सकून मिलता है वह दुनियाँ में शायद
इतनी आसानी से और द्वारों द्वारा न मिल पाये…
मैं यह मानता हूँ कि विश्व स्तर पर हमें बहुत से
नये आयाम तलाशने हैं…और काफी से बेकार के
अवरोधों को काटना है, जिससे सिनेमा का
विकास मानसिक स्तर और मनुष्य के भीतरी
अवस्थाओं तक हो जिसे वृहत रुप में दिखाया जा सके।

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