SALO- 120 दिन सोडोम का…एक समीक्षा।  

Friday, November 30, 2007



MOVIE - Salo or The 120 days of Sodom
(Salo le 120 giornate di sodoma)
YEAR - 1976, Italy
DIRECTOR - Pier Paolo Pasolini
GENERE - Drama, War
CAST - Giorgio, Umbreto
LANGUAGE - Italian, French, German
"BIG DADDY OF ALL DISTURBING MOVIE"
मेरे लिए इतना ही कहना शायद ज्यादा है…।
कल ही मुझे इस फिल्म की कॉपी उपलब्ध हुई;
जब से इसके बारे में सुना था इसे देखने का
मेरा मन इसकदर उतावला हो रहा था कि
बार-बार प्रयास करता था कि ये मुझे देखने
को कहीं मिल जाए।
यह एक RARE FILM है जिसकी
DVD मिलती ही नहीं है…पर
किस्मत साथ था और सारी
कायनात ने मिलकर मुझे
इससे मिला दिया…
(ओम शांती ओम से लिया)…
हाSSहाSS
खैर, जिन बंधुओं को भी परेशान
(Disturbing) करने वाली
फिल्म अच्छी लगती है…
वे इसे एकबार अवश्य देखें…
फिल्म के रिलीज के दिन
ही इसके डॉयेरेक्टर की
हत्या दिया गयी थी, जो
अपने-आप में एक बड़ा सदमा है।



एक प्रबल दु:खद, मानसिक, शारीरिक यातना की पराकाष्ठा
पर केंद्रीत अति-विवादास्पद फिल्म जिसे देखने के लिए
एक बिल्कुल सामान्य शांत मस्तिष्क का होना जरुरी है…
आज भी कई देशों में ये मुवी प्रतिबंधित है…।
साधारण रुप से इसकी कहानी विश्व युद्ध-2 पर आधारित है।
इटली पर मुसोलनी के शासन का अंतिम
दौर … Republic Of Salo एक फासीवादी राज्य, जो
जर्मनी के कब्जे में था 1944 में। Pasolini ने शायद
बहुत करीब से सारे मंजर को देखा था और काफी
यातनाएँ भी झेली थीं, यह फिल्म उसी भीतरी
आक्रोश का परिणाम था किंतु इसके बनते ही
उनकी हत्या कर दी गई…।
इस फिल्म का प्रत्येक दृश्य दहला देने वाला है जिसे आम
दर्शक तो निगल ही नहीं पायेगा… बहुत सारे NUDE SCENES
हैं या यों कहें पूरी फिल्म ही ऐसे ही है जो बहुत ही सांकेतिक
है… शासन के चार मुख्य स्तंभ -- The Duc, The President,
The Bishop, The Magistrate जो शायद धुरी राष्ट्र को दर्शाता
है जहाँ 18 पुरुष और 18 महिलाओं को अपहृत कर एक बड़े से
महल में रखा जाता है… साथ में चार वैश्याएँ होती हैं जो
काम-वासना के नए-नए तरीके सिखाती हैं… और बहुत
सारे शारीरिक और मानसिक यातना के बाद उनकी
जघन्य हत्या कर दी जाती है… वैसे अगर देखा जाए तो
यह एक बहुत ही साधारण कहानी है पर जिस प्रकार से
इसे चित्रित किया गया है वह निश्चित ही देखने लायक
है… शायद आप भूत की फिल्म को देख उतना ना डरे पर
जो घबराहट इसे देखते हुए मुझे हुई वह मैं बता ही नहीं सकता,
पूरा एक दिन मुझसे खाना नहीं खाया गया…।
जितने भी बलात्कार, मानसिक यातनाएँ हुई हैं इसमें कोई
भी दृश्य अकेले में नहीं फिल्माया गया है सारे-के-सारे
दृश्य कम-से-कम 30-40 लोगों के सामने है…
सबसे डरावना सीन है-- जब महिलाओं को नंगा
कर गले में कुत्ते का पट्टा बांधकर कच्चा मांस खाने
को मजबूर किया जाता है सच कहूं बहुत ही घिनौना
है… ओ ओ SSSS
लेकिन ये सब इतना सांकेतिक है कि थोड़ा सोंचा जाए
तो डॉयेरेक्टर के अंदर की बात सामने आने लगती है,




मानव का भीतरी अंतस पाशविक वृत्तियों का ही गुलाम
होता है जिसे अगर पूर्णत: स्वतंत्र कर दिया जाए तो
वह जानवर के जैसा ही व्यवहार करेगा और यही मानवीय
अंधेरा जो हम सभी में व्याप्त है इस फिल्म का मूल
संदेश है… इसे इतना विकृत रुप में दिखाया गया है
जिसे हम देख ही नहीं सकते…। बहुत ही जटिल फिल्म
जो हमें हिटलर, मुसोलनी जैसे कुत्सित व्यक्तित्व का
सच प्रकट करती है… आप साधारण रुप में तो इसे देखने के
बाद मानव से ही घृणा करने लग जाएंगे। कई समीक्षकों
ने तो यहाँ तक कहा की यह फिल्म नहीं Posolini के
Sexual Frustration का परिणाम है जो 18 महिलाओं और
18 पुरुष को असामान्य रुप में संभोग करते देखना व खुद
को आनंदित करना है…।
हाँ एकबात अवश्य कहना चाहूंगा कि यह फिल्म आम
लोगों के लिए तो है ही नहीं और पारिवारीक तो
बिल्कुल नहीं, अगर यह फिल्म मिल जाए तो
यह अवश्य सुनिश्चित कर लें की आपकी मानसिक
स्थिति इसे पचा ले…।

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सिनेमा…Entertainment औR कला !!!  

Saturday, November 3, 2007




विश्व सिनेमा का इतिहास काफी पुराना है… जब पहली
बार Pinhole camera(Aristotle)का निर्माण संभव हुआ और बाद में
Frisius ने Camera Obscura ( जिसमें कोई लेंस नहीं था…मात्र कुछ
कागज के टुकड़े थे) ने सिनेमा का मार्ग प्रशस्त किया…फिर यूरोप के
Lumiere Brothers ने 1895 में कैमरा और प्रोजेक्शन को मिला पहला
Cinematography कैमरा तैयार किया जिसमें 35mm film / 16f/s के
हिसाब से चलता था इस कारण ही उस वक्त के सिनेमा-पट पर पात्र तेज
गति से चलते नजर आते थे…। भारत में भी इसकी शुरुआत 1896 में
होटल वॉटसन परिसर में उपर के दोनों भाइयों ने ही अपनी पहली मुवी
"Arrivee d'un Train a la Gare de Ciotat" (Arrival of aTrain at Ciotat
Station) और"La Sortie de l'Usine" (Leaving The Factory) दिखाई
जो सिर्फ यूरोप में दिखाने के 6 महीने बाद ही भारत मे भी लाई गई थी।
मेरा ये सब लिखने का मात्र यही कारण है कि अगर सामन्य रुप से देखा
जाए तो हम मात्र आधे साल ही पिछे हैं सिनेमा के स्तर से किंतु हमारा
सिनेमा लगातार पतन की ओर ही उन्मुख हैं… साल में कुछ 2-4 ही
ऐसी फिल्में आती हैं जिसे देखकर लगता है कि वह हमसे कुछ कह रही हैं…
जिसमें कुछ नई बात होती है…जो हमसे प्रश्न पूछती है…जो दिखलाती हैं
कि इसका सही रुप क्या है…।
सिनेमा-- The Highest Form Of Art मतलब साफ है कि यह
एक ऐसा कला-माध्यम है जिसके गर्भ में समस्त कला का समागम संभव
है और है भी, जहाँ कला का पूरा स्वरुप निखर कर बाहर आता है…पर
हमने क्या किया है इसे और ज्यादा निखारने के लिए मात्र पैसे के लिए
हमने इस कला को गर्त में पहुंचाया गया… कहते हैं कि Canne's Film fest..
में लोग हमारी फिल्मों को देखकर हंसते-2 गिर जाते है। जब हमारा भारत
80% अशिक्षित था तब हमारे हिंदी सिनेमा ने राज-कपूर, बिमल राय,गुरु-दत्त
जैसे महान निर्माता- निर्देशक दिये ,जिनकी फिल्में हमारे पास एक अद्भुत
संग्रह के रुप में मौजूद हैं एवं बाक्स आफिस पर हिट भी रही हैं पर आज
जब हम 80% शिक्षित हैं तो सिनेमा का स्तर और ज्यादा गिर गया है…
हाँ एक बात मै बताना चाहता हूँ कि ये सभी बातें मैंने मात्र "हिंदी सिनेमा"
के लिए की हैं… भारत में ही दो ऐसे प्रांतीय सिनेमा उद्योग हैं---
एक "बंगाली" दूसरा "मल्लयाली", जिसने एक से बढ़कर एक फिल्में भारत
को दी हैं… मौका मिला तो कुछ फिल्में जो मैंने देखी हैं उसपर चर्चा अवश्य
करुंगा। तो यह कीड़ा सिफ हमारे उद्योग को ही लगा है, जो एक बड़ा अश्चर्य है…
हमारे सारे फिल्म उद्योग के लोग यही कहते पाये जाते हैं कि अभी हमारा
समाज अनुभवहीन हैं पर जो नंगा नाच हमारी फिल्मों में दिखाया जा रहा है
वह तो यही वर्ग है जो समझता भी है और मजे भी लेता है किंतु अर्थपूर्ण
सिनेमा के लिए यह वर्ग तैयार नहीं है, कुछ अजीब नहीं लगता है…???
आज हम निश्चित ही सिनेमा के लिए अशिक्षित हैं पर इसे
सिनेमा के द्वारा ही शिक्षित भी किया जा सकता है… स्कूल में हम निरंतर
उच्च शिक्षा की ओर बढ़ते रहते हैं और यह काम एक शिक्षक का होता है…
उसीप्रकार एक निर्देशक ही हमें उस मकाम तलक ले जा सकता है जहाँ
“विश्व सिनेमा” पहुंचा है…।

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